The psychology of mass hysteria – when crowds lose control

The psychology of mass hysteria – when crowds lose control

मास हिस्टीरिया का मनोविज्ञान: जब भीड़ अपना नियंत्रण खो देती है

परिचय: भीड़ की मानसिकता का रहस्य

इतिहास गवाह है कि जब लोग समूह में इकट्ठा होते हैं, तो उनका व्यवहार अक्सर व्यक्तिगत व्यवहार से बिल्कुल अलग हो जाता है। शांत, तर्कसंगत और जिम्मेदार व्यक्ति भी कभी-कभी भीड़ का हिस्सा बनकर ऐसा कदम उठा लेते हैं, जिसकी वे अकेले में कल्पना भी नहीं करते। यही स्थिति जब सामूहिक भावनाओं, डर, गुस्से या भ्रम के कारण नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो उसे “मास हिस्टीरिया” या सामूहिक उन्माद कहा जाता है। यह केवल हिंसक दंगों तक सीमित नहीं है; कई बार यह अफवाहों, भय, बीमारी के भ्रम या सामूहिक घबराहट के रूप में भी सामने आता है। सवाल यह है कि आखिर भीड़ में ऐसा क्या होता है, जो इंसान की सोच और व्यवहार को पूरी तरह बदल देता है?


मास हिस्टीरिया क्या है?

मास हिस्टीरिया एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग एक साथ तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया दिखाते हैं—चाहे उसका कोई ठोस कारण न हो। यह प्रतिक्रिया भय, गुस्से, भ्रम या किसी काल्पनिक खतरे से प्रेरित हो सकती है। कई बार लोग एक-दूसरे के व्यवहार की नकल करते हैं, जिससे स्थिति तेजी से फैलती है।

इसे “सामूहिक मनोवैज्ञानिक बीमारी” (Collective Psychogenic Illness) भी कहा जाता है। इसमें शारीरिक लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं—जैसे चक्कर आना, बेहोशी या घबराहट—लेकिन मेडिकल जांच में कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता। इसका मूल कारण मनोवैज्ञानिक होता है, जो सामाजिक वातावरण से प्रभावित होता है।


भीड़ में व्यक्तित्व क्यों बदल जाता है?

जब कोई व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनता है, तो उसकी व्यक्तिगत पहचान कुछ हद तक धुंधली हो जाती है। मनोविज्ञान में इसे “डी-इंडिविजुएशन” कहा जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने कार्यों की जिम्मेदारी कम महसूस करता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह भीड़ में खो गया है।

भीड़ का सामूहिक उत्साह, नारे, शोर और भावनात्मक ऊर्जा व्यक्ति के दिमाग पर गहरा प्रभाव डालते हैं। परिणामस्वरूप, तर्कसंगत सोच कमजोर हो जाती है और भावनात्मक प्रतिक्रिया मजबूत हो जाती है। यही कारण है कि शांत स्वभाव का व्यक्ति भी भीड़ में आक्रामक हो सकता है।


संक्रमण की तरह फैलती भावनाएँ

भावनाएँ भी वायरस की तरह फैल सकती हैं। यदि भीड़ में कुछ लोग घबराए हुए हैं, तो वह घबराहट धीरे-धीरे पूरे समूह में फैल सकती है। इसे “इमोशनल कंटेजन” यानी भावनात्मक संक्रमण कहा जाता है।

मान लीजिए किसी सार्वजनिक स्थान पर अचानक किसी ने चिल्लाकर कहा कि खतरा है। भले ही वास्तविक खतरा न हो, लेकिन लोग एक-दूसरे को भागते देखकर स्वयं भी भागने लगते हैं। कुछ ही मिनटों में अफरा-तफरी मच जाती है। बाद में पता चलता है कि खतरा था ही नहीं।


अफवाह और डर की शक्ति

मास हिस्टीरिया का सबसे बड़ा कारण अफवाह है। जब जानकारी अधूरी या अस्पष्ट होती है, तो लोग अपने अनुमान से उसे भर देते हैं। यदि समाज पहले से तनाव में हो—जैसे राजनीतिक अस्थिरता, महामारी या आर्थिक संकट—तो अफवाहें और भी तेजी से फैलती हैं।

डर एक मूलभूत भावना है, जो व्यक्ति को सुरक्षा के लिए तुरंत प्रतिक्रिया करने पर मजबूर करती है। भीड़ में यह डर कई गुना बढ़ जाता है। लोग बिना पुष्टि किए प्रतिक्रिया दे देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि देर करने से खतरा बढ़ सकता है।


ऐतिहासिक उदाहरण

इतिहास में कई घटनाएँ मास हिस्टीरिया का उदाहरण रही हैं। मध्यकालीन यूरोप में “डांसिंग प्लेग” नामक घटना दर्ज है, जहाँ सैकड़ों लोग अचानक नाचने लगे और कई दिनों तक रुक नहीं पाए। चिकित्सकीय कारण स्पष्ट नहीं था, लेकिन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबाव को संभावित कारण माना गया।

इसी तरह, विभिन्न समयों में “जादू-टोना” के आरोपों के कारण सामूहिक भय फैल गया। लोग बिना ठोस सबूत के एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे। यह सामूहिक उन्माद का परिणाम था, जिसमें तर्क और न्याय पीछे छूट गए।


मीडिया और आधुनिक युग

आज के डिजिटल युग में मास हिस्टीरिया का रूप बदल गया है। सोशल मीडिया पर फैली एक अफवाह कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। यदि संदेश भावनात्मक हो—जैसे किसी खतरे या षड्यंत्र की बात—तो लोग उसे तेजी से साझा करते हैं।

कई बार गलत जानकारी के कारण बाजारों में घबराहट, दवाइयों की कमी या सामाजिक तनाव पैदा हो जाता है। डिजिटल भीड़ भले ही शारीरिक रूप से एक साथ न हो, लेकिन मानसिक रूप से एक सामूहिक प्रतिक्रिया दे सकती है।


मनोवैज्ञानिक कारण

मास हिस्टीरिया के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारक काम करते हैं। पहला है “कन्फर्मेशन बायस”—लोग वही मानना पसंद करते हैं, जो उनकी पहले से बनी धारणाओं से मेल खाता हो। यदि कोई अफवाह उनकी सोच से मेल खाती है, तो वे उसे सच मान लेते हैं।

दूसरा कारण है “सामाजिक पहचान सिद्धांत”। लोग अपने समूह की पहचान से जुड़ाव महसूस करते हैं। यदि समूह में एक भावनात्मक प्रतिक्रिया शुरू होती है, तो व्यक्ति भी उसी दिशा में प्रतिक्रिया देने लगता है, ताकि वह समूह से अलग न दिखे।


भीड़ में नैतिकता का क्षरण

भीड़ में व्यक्ति अक्सर यह महसूस करता है कि उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी कम हो गई है। इस स्थिति में नैतिक सीमाएँ कमजोर पड़ सकती हैं। जो कार्य वह अकेले में गलत समझता, वही भीड़ में उसे उचित लग सकता है।

यह स्थिति दंगों या हिंसक प्रदर्शनों में स्पष्ट दिखाई देती है। समूह का गुस्सा व्यक्ति की व्यक्तिगत नैतिकता को दबा देता है।


क्या मास हिस्टीरिया हमेशा नकारात्मक होता है?

सामूहिक भावना हमेशा नकारात्मक नहीं होती। कई बार सकारात्मक भावनाएँ भी भीड़ में फैलती हैं—जैसे उत्सव, प्रेरणा या सामाजिक एकता। लेकिन जब भावनाएँ नियंत्रण से बाहर हो जाएँ और तर्कसंगत सोच खत्म हो जाए, तभी समस्या उत्पन्न होती है।

इसलिए भीड़ की ऊर्जा को सही दिशा में ले जाना नेतृत्व और जागरूकता पर निर्भर करता है।


रोकथाम और समाधान

मास हिस्टीरिया को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है सही और समय पर जानकारी। पारदर्शी संचार, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और अफवाहों का तुरंत खंडन स्थिति को शांत कर सकता है।

शिक्षा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि लोग आलोचनात्मक सोच विकसित करें और हर सूचना पर तुरंत विश्वास न करें, तो सामूहिक भ्रम की संभावना कम हो सकती है।


व्यक्ति की भूमिका

भीड़ का हिस्सा बनते समय व्यक्ति को अपने विवेक को सक्रिय रखना चाहिए। यदि कोई स्थिति भावनात्मक लग रही हो, तो रुककर सोचना आवश्यक है। क्या जानकारी सत्यापित है? क्या प्रतिक्रिया उचित है? ऐसे प्रश्न सामूहिक उन्माद को रोक सकते हैं।

व्यक्ति का आत्म-नियंत्रण ही भीड़ के नियंत्रण की कुंजी है।


निष्कर्ष: भीड़ और मनुष्य के बीच संतुलन

मास हिस्टीरिया हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य केवल तर्कसंगत प्राणी नहीं है; वह भावनात्मक और सामाजिक भी है। भीड़ की शक्ति सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है, लेकिन वही शक्ति विनाशकारी भी हो सकती है।

जब भावनाएँ तर्क पर हावी हो जाती हैं, तो भीड़ नियंत्रण खो देती है। इसलिए समाज के लिए आवश्यक है कि वह जागरूकता, शिक्षा और जिम्मेदार संचार को प्राथमिकता दे।

अंततः, भीड़ का नियंत्रण व्यक्ति के नियंत्रण से शुरू होता है। यदि हर व्यक्ति अपने विवेक को बनाए रखे, तो सामूहिक उन्माद की संभावना कम हो सकती है। मास हिस्टीरिया का मनोविज्ञान हमें चेतावनी देता है—भीड़ की ऊर्जा शक्तिशाली है, लेकिन उसे दिशा देना हमारे हाथ में है।

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