Why Are US Elections Held on Tuesday? The 1845 Reason Behind It
अमेरिका में चुनाव मंगलवार को ही क्यों होते हैं? इसके पीछे 180 साल पुराना किसानों वाला कारण
कल्पना कीजिए कि दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी का फैसला किसी छुट्टी के दिन नहीं, बल्कि एक आम कामकाजी दिन पर होता है। लोग दफ्तर जाने से पहले या बाद में लाइन में लगकर वोट डालते हैं। यही अमेरिका में होता है। 3 नवंबर 2026 को भी वहां मिडटर्म चुनाव का मतदान मंगलवार को ही था।
अब सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक ने वोटिंग के लिए ऐसा दिन क्यों चुना, जिसमें ज़्यादातर लोगों को काम भी करना होता है?
शुरुआत में यह अजीब लगता है। लेकिन इसका जवाब किसी चुनावी रणनीति में नहीं, बल्कि 19वीं सदी के खेतों, घोड़ागाड़ियों और बाज़ार के दिन में छिपा है।
हर राज्य अपनी मर्ज़ी से वोट डालता था
1845 से पहले अमेरिका में पूरे देश के लिए एक तय चुनाव-दिवस नहीं था। राष्ट्रपति चुनने वाले इलेक्टर्स की नियुक्ति के लिए हर राज्य एक लंबी समय-सीमा के भीतर अपनी सुविधा से तारीख चुन सकता था। यह सीमा दिसंबर के पहले बुधवार से पहले के 34 दिनों की थी।
सोचिए, अगर भारत के लोकसभा चुनाव में एक राज्य के नतीजे आ चुके हों और बाकी राज्यों में वोटिंग अभी बाकी हो, तो क्या होगा? आज भारत में भी चुनाव कई चरणों में होते हैं, इसलिए यह बात आपको समझ आएगी।
अमेरिका में भी यही चिंता थी। जल्दी वोट डालने वाले राज्यों के नतीजे बाद में वोट डालने वाले राज्यों का मूड बदल सकते थे। हो सकता है, कोई राज्य आख़िर में वोट डालकर पूरे देश का फैसला पलट दे।
1845 में कांग्रेस ने क्या किया?
इसी उलझन को सुलझाने के लिए 1845 में अमेरिकी कांग्रेस ने एक कानून पास किया। उसने कहा कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के इलेक्टर्स की नियुक्ति “नवंबर महीने के पहले सोमवार के बाद आने वाले मंगलवार” को होगी।
शुरुआत में यह नियम सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव के लिए था। बाद में यही तारीख़ कांग्रेस के चुनावों के लिए भी अपना ली गई।
लेकिन यहां एक और दिलचस्प सवाल उठता है। दिन मंगलवार ही क्यों चुना गया? और नवंबर ही क्यों?
1845 के अमेरिका में किसान ही सब कुछ थे
उस समय अमेरिका ज़्यादातर खेती पर चलने वाला देश था। ज़्यादातर लोग किसान थे और उनका साल फसल के चक्र के हिसाब से चलता था।
- वसंत और गर्मियों की शुरुआत में बुवाई का समय था, इसलिए चुनाव के लिए ये महीने ठीक नहीं थे।
- गर्मियों के अंत और शुरुआती पतझड़ में फसल कटाई होती थी, तो किसान खेतों में व्यस्त रहते थे।
- नवंबर तक फसल कट चुकी होती थी, लेकिन कड़कड़ाती सर्दी और बर्फ़ अभी पूरी तरह नहीं आई होती थी, जिससे सड़कों पर चलना मुश्किल हो जाता है।
इसलिए नवंबर सबसे व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरा।
तो फिर मंगलवार ही क्यों? बाकी दिनों में क्या दिक्कत थी?
यहीं कहानी और दिलचस्प हो जाती है।
उस ज़माने में पोलिंग बूथ अक्सर कई मील दूर होता था, और वहां पहुंचने में पूरा दिन लग सकता था। वोट डालने के लिए एक दिन पहले ही निकलना पड़ता था।
अब देखिए दिनों का हिसाब:
- रविवार चर्च और प्रार्थना का दिन था, इसलिए वोटिंग के लिए सही नहीं था।
- सोमवार को वोट डालने के लिए लोगों को रविवार को ही सफर शुरू करना पड़ता, जो चर्च के दिन से टकराता।
- बुधवार किसानों के लिए बाज़ार का दिन था, जब वे अपनी फसल बेचने जाते थे।
इन सबके बीच मंगलवार सबसे कम टकराव वाला दिन बचा। हालांकि इतिहासकार इन कारणों को आमतौर पर सबसे संभावित वजह मानते हैं, यह भी सच है कि उस समय की हर चर्चा का पूरा रिकॉर्ड हमारे पास नहीं है।
“पहले सोमवार के बाद“ वाला नियम क्यों?
इसका असर यह होता है कि चुनाव कभी 1 नवंबर को नहीं पड़ता। अगर 1 नवंबर को मंगलवार हो, तो चुनाव अगले हफ्ते, यानी 8 नवंबर को होता है।
कुछ लोग इसके पीछे व्यापारियों के हिसाब-किताब का तर्क देते हैं, लेकिन इसे पक्के सबूत वाली बात मानना ठीक नहीं होगा। पक्की बात बस इतनी है कि नियम की यह बनावट हर साल तारीख को 2 से 8 नवंबर के बीच रखती है।
आज यह तरीका अजीब क्यों लगता है?
अब ज़माना बदल चुका है। ज़्यादातर लोग किसान नहीं हैं, और किसी को बाज़ार जाने के लिए घोड़ागाड़ी से सफर नहीं करना पड़ता।
फिर भी चुनाव मंगलवार को ही होता है। और मंगलवार राष्ट्रीय छुट्टी नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 29 राज्यों और वॉशिंगटन डी.सी. में ऐसे कानून हैं जो वोट देने के लिए काम से समय निकालने का अधिकार देते हैं। उनमें से भी सिर्फ 23 राज्यों में उस समय की तनख्वाह मिलना ज़रूरी है। नियम राज्य-दर-राज्य अलग हैं, इसलिए अपने राज्य के ताज़ा नियम देख लेना बेहतर रहता है।
यही वजह है कि अमेरिका में लंबे समय से बहस चल रही है कि चुनाव को वीकेंड पर कर दिया जाए, या मंगलवार को ही राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर दिया जाए। विरोधियों का तर्क है कि वीकेंड पर लोग यात्रा या छुट्टी में व्यस्त हो सकते हैं, या धार्मिक आयोजनों से टकराव हो सकता है। फिलहाल कानून जस का तस है।
दूसरी तरफ़, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में चुनाव हमेशा वीकेंड पर होते हैं, और वहां मतदान के दिन “डेमोक्रेसी सॉसेज” यानी मतदान केंद्रों पर बिकने वाले सॉसेज की बात भी मशहूर है।
एक आख़िरी बात जो सोचने लायक है
अगली बार जब आप अमेरिकी चुनाव की खबर देखें, तो यह याद रखिए: दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी का फैसला आज भी उस कैलेंडर से तय होता है, जो बैलगाड़ी के ज़माने में किसानों की सुविधा के लिए बना था।
तो असली सवाल यह है: क्या एक कानून, जो 180 साल से ज़्यादा पुराना है और जिसे खेतों के हिसाब से बनाया गया था, आज के डिजिटल ज़माने में भी सही बैठता है?